बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥
"जय श्री राम - जय हनुमान"
प्राचीन सिद्धपीठ हनुमान मंदिर-खासपुर
हनुमत: शक्ति– संजीवनी-पर्वत का पवित्र अंश | आध्यात्मिक-ऊर्जा का अद्भुत केंद्र
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संक्षिप्त परिचय:
द्वापर युग की पौराणिक कथा अनुसार श्रीहनुमान जी द्वारा लाए गए संजीवनी पर्वत का अंश “दिव्य-शिला” आज भी आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। यहाँ एक लोटा जल अर्पण करने से श्रद्धालुओं को सकारात्मक शक्ति एवं जीवन समस्याओं के समाधान का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
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दिव्य शिला की पौराणिक कथा
हनुमान जब संजीवनी बूटी लाने हेतु हिमालय की ओर गए और पर्वत सहित लौट रहे थे, तब भरत ने उन्हें आकाश में देखकर भ्रमवश शत्रु समझ लिया और बाण चला दिया।
इस घटना के दौरान पर्वत का एक अंश भूमि पर गिरा — जिसे आज “दिव्य शिला” के रूप में पूजित माना जाता है।
यह शिला वर्तमान में पाँच भागों में सुरक्षित है पूर्ण श्रद्धा या विश्वास के साथ इसका चोला चढ़ाने पर भक्तों की सर्व मनोकामना पूर्ण होती है और श्रद्धालुओं द्वारा अत्यंत श्रद्धा से पूजित की जाती है।
दिव्य मान्यता
एक लोटा जल अर्पण करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
सकारात्मक ऊर्जा एवं मानसिक शांति की अनुभूति होती है।
समृद्धि एवं उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
लगभग 45 वर्ष पूर्व यहाँ केवल एक खुला चबूतरा था, बाद में मंदिर संरचना निर्मित हुई।
मंदिर निर्माण का इतिहास
प्राचीन सिद्धपीठ हनुमान मंदिर – ऐतिहासिक विकास यात्रा:
यह पावन धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या और ग्राम-समर्पण की जीवंत परंपरा है। इसका इतिहास त्याग, संकल्प और सामूहिक श्रद्धा से निर्मित हुआ है।
स्थापना काल (1962)
सन् 1962 में स्वर्गीय चौधरी लहरी सिंह त्यागी जी ने अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर खुले स्थान में एक चबूतरा बनवाकर श्रीहनुमान जी की प्राण-प्रतिष्ठा कराई।
उनकी मनोकामना उस समय पूर्ण हुई जब उनके पुत्र का चयन पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर पद पर हुआ। यह घटना मंदिर स्थापना की प्रेरणा बनी।
सामुदायिक जागरण एवं दीपावली मेला (1966)
सन् 1966 में स्वप्न-संदेश की प्रेरणा से ग्राम के प्रतिष्ठित जन —
स्व.ब्रह्मजीत सिंह त्यागी, श्री मूलचंद त्यागी, श्री त्रिलोकचंद गर्ग तथा अन्य ग्रामीणों ने दीपावली के अवसर पर दो दिवसीय भव्य मेले की शुरुआत की।
इस मेले में आयोजित कार्यक्रम:
वैदिक यज्ञ
कुश्ती दंगल
युवा खेल प्रतियोगिताएँ
भजन, कीर्तन एवं आध्यात्मिक सभाएँ
यह परंपरा अनेक वर्षों तक निरंतर चलती रही और मंदिर क्षेत्र आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन गया।
प्रारंभिक मंदिर संरचना (1984)
सन् 1984 में स्वर्गीय राजेश त्यागी तथा ग्रामवासियों के सहयोग से मंदिर का एक सरल एवं स्थायी ढांचा निर्मित किया गया।
इस पावन कार्य में ग्राम समुदाय ने तन-मन-धन से योगदान दिया।
तपस्या एवं अखंड सेवा काल (1999 तक)
8 फरवरी 1999 तक मंदिर में नियमित पुजारी सेवा उपलब्ध नहीं थी। लोकमान्यता थी कि बाबा किसी की सेवा स्वीकार नहीं करते।
तत्पश्चात सीतापुर से एक दिव्य आत्मा, परम भक्त स्व.पं.कृष्ण चन्द्र शर्मा शास्त्री जी द्वारा, -बाबा कीआजीवन सेवा का व्रत लिया।
उनकी सेवा-यात्रा अत्यंत तपस्वी रही—
अपने एकमात्र पुत्र एवं पुत्रवधूऔर पत्नी का वियोग सहा
जीवन के अंतिम वर्षों में स्वयं गंभीर चिंताओं का सामना किया
फिर भी अंतिम श्वास तक मंदिर सेवा नहीं छोड़ी
उन्होंने तप सेवा से विशेष “मनोकामना यज्ञ”, आरती, भंडारा, जागरण-कीर्तन आदि धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा प्रारंभ की, जो आज भी निरंतर जारी है।
आध्यात्मिक विस्तार एवं वर्तमान स्वरूप
स्वर्गीय पं. कृष्ण चंद्र शास्त्री जी को इस मंदिर का प्रथम संस्थापक पुजारी गौरव प्राप्त है, जिनकी दूरदर्शिता से मंदिर परिसर का विस्तार हुआ।
वर्तमान में मंदिर परिसर में निम्न पवित्र मंदिर भी शोभायमान हैं:
श्री हनुमान जी-मंदिर,
प्रेतराज सरकार मंदिर
भैरव जी मंदिर
शनि देव मंदिर
शिव परिवार मंदिर
नवग्रह मंदिर
राम दरबार
इस प्रकार यह स्थल एक बहुआयामी आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो चुका है।